Prakash thakur

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Tuesday, 13 September 2011

gonu jha - guru ka aasirbad


गोनू झा नित्य पाठशाला तं जाइत छलाह मुदा पाठ कहियो याद नहि करैत छलाह | गुरु जी हुनका डाँट - दबाड़ करैत छलथिन मुदा ओ तकर कनिको फिकिर नहि करैत छलाह |

एक दिन गुरूजी सभ विद्यार्थीसँ पाठ सुनि रहल छलाह | सभ गोटे अपन - अपन पाठ सुना देलनि, मुदा गोनू झाक बेर अयलनि तं ओ कहलथिन - गुरूजी आइ नै काल्हि सूना देब |

गुरूजी बजलाह - " अच्छा, जँ काल्हि नहि सुनयबी तs पीठक खाल खीचि लेबह | "

छुट्टी भेल | सभ विद्यार्थी अपन - अपन घर चलि पड़लाह |

दोसर दिन सभ विद्यार्थी पाठशाला पहुँचला | गोनू झा सभसँ आगू अपन जगह पर डटल छलाह |

कनेक कालक बाद गुरूजी कक्षामे अयलाह | ओ गोनू झासँ - " की गोनू, पाठ याद कयलौं ने ? "

- " हँ गुरूजी | '

- " तs सुनाउ! "

- " आइ नै, काल्हि गुरूजी! "

- " से कियक? "

- " अहाँ आइ नै, काल्हि सुनयबाक लेल कहने रही! "

गोनू झाक बुधियारी गुरूजी बुझि गेलाह, ओ कहलनि - " गोनू, हम अहाँकेँ चीन्हि गेलौं अछि | हम अहाँक खाल घीचि लेब !

- " गुरूजी ! हम वर्ख दिनसँ पाठशाला आबि रहल छी | हम गोनू छी | आ से अपने अखन धरि चिन्हने नै रही? "

- " हम आहाँ केँ नीक जकाँ चीन्हि गेल छी | अहाँ एक नम्बरक फनटूस लड़का छी | हम आइ फेर कहि दैत छी जे काल्हि अर्थात वृहस्पतिकेँ सम्पूर्ण पोथी समाप्त कs नै अनलौं, तs बुझि लिअs जे अहाँक कुशल नहि अछि |


- ' जे आज्ञा गुरूजी | " गोनू नहुएसँ बजलाह |

वृहस्पतिकेँ गोनूझा समय पर पाठशाला पहुँचलाह | अबितहि ओ गुरूजीसँ कहलनि - " गुरूजी, हम पोथीकेँ समाप्त कs देल अछि | "

- " लाउ पोथी ! एखने हम पुछै छी | "

- " हम तs ओकरा काल्हि सांझहिमे समाप्त कs देलहु, आब कतs सँ दिअ?

- " हम कहै छी, पोथी लाउ ! "

- " अहाँ नै बुझलियै गुरूजी, हम अहाँक आज्ञानुसार काल्हि जाइते पोथीकेँ फाड़ी समाप्त कs देल | "

- " रे गोनुआ! हम कहि दै छिऔ, काल्हि नव पोथी कीनि कs पाठ नै सुनयलें तs तोहर प्राण लs लेबौ | "

- " अबस्स लs लेब गुरूजी! मुदा ई तs बुझा दिअ जे प्राणक की रूप अछि? "

- " प्राणक कोनो रूप नहि होइछ गोनू | ई प्रत्येक शरीरमे हवाक रूपमे वर्तमान रहैत अछि!

- " तखन तs हम एखनो बुझा दैत छी | "

- " की? "

- " यैह जे नव पौथीक लेक माय हमरा पाइ नहि देतीह तेँ हमार शारीरसँ प्राण लs लिअ एखने प्राण दs रहल छी | " आ ई कहैत गोनू झा मुँहसँ हवा छोड़य लगलाह |

गुरूजीकेँ हँसी लागि गेलनि, ओ कहलथिन - " गोनू, तोरा विद्या नहि लिखल छह | परंच बुधयारीमे तोरा क्यो पछाड़ी नहि सकैत छथुन | ई आशीर्वाद छह | "

गोनू झा माथ झुका ई आशीर्वाद ग्रहण कयलनि |
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Maithili kahanin - pita ka aasirbad

गोनू झाक पिताकेँ ज्योतिषी लोकनिसँ हाथ देखेबाक बड़ सौख रहनि | दूर दूरसँ हस्तरेखा देखनिहार आबथि आ हुनका बूडि बना पाइ ऐंठी, विदा भs जाइत छलाह |

एक दिन गोनू झाकेँ किछु पैसाक आवश्यकता छलनि | ओ अपन पितासँ छलनि | ओ अपन पितासँ पाइ मँगलनि मुदा पिता पाइ देब अस्वीकार कs देलथिन | तखन गोनू झा हुनक दुर्वलतासँ लाभ उठ्यबाक व्योंत लगओलनि | आ एकटा नाटक मंडलीमे गेलाह | ओतsसँ गेरुआ वस्त्र, जटा आ एकटा कमण्डल भाड़ा पर लs अनलनि | पशचात ओ गेरुआ वस्त्र पहिरलनि, माथ पर जटा जगओलनि, देहमे विभूति लेपलनि तथा हाथमे कमण्डल धारण कs अपन घरक मुहँथरि पर पहुँचि गेलाह | महात्मा बुझि गोनू झाक पिता हुनका बड़ आदरसँ बैसओलनि आ पुछ्लनि - " महाराज, कतs आगमन भेलैक अछि? "

महात्माजी मुहँ पर आंगुर राखि स्वयंकेँ यौनी बाबा कहलनि आ इशारासँ बुझओलानी जे हम सिलेट - पाटी पर लिखिकs गप्प करब |

गोनू झाक पिता महात्माजीकेँ नीक - निकुत भोजन करओलनि | तदुपरांत अपन भाग्यक मादे जिज्ञासा कयलनि |

महात्माजी गोनुझाक पिताक - आगू - पाछंक सम्पूर्ण खेढ़ा कहि देलथिन | ओ ई सुनि गद् - गद् भs गेलाह तथा महात्माजीकेँ दक्षिणास्वरुप बहुत रास धन एवं एकटा औंठी प्रदान कयलनि |

एम्हर महात्माजीक भविष्यवाणी पर सम्पूर्ण गाममे हल्ला मचि गेल | सभ अपन - अपन भाग्य पुछबाक लेल हुनका लsग आबs लागल |

महात्माजी सभक वखान करैत धन बटोरय लगलाह | किछुए दिनमे बहुत रासधन एकट्ठा भs गेलनि आ ओ ओतsसँ डेरा तोड़लनि | गामसँ बहरा ओ अपन हुलिया बदललनि आ अपन वास्तबिक भेषमे आबि गेलाह | महात्माक भेषके नाटक - मंडलीकेँ सुपुर्द कs किछु दिन भरि एम्हर - ओम्हर मटरगस्ती करैत रहलाह |

एक दिन सहसा ओ घर घुरलाह | पिताकेँ हजारो टका आ एकटा औंठी देलनि |

अपन औंठी देखि गोनू झाक पिताकेँ बड़ अचरज भेलनि, ओ पुछलथिन - " अयँ हओ, ई औंठी कतs भेटलह | '

गोनू झा सम्पूर्ण रहस्य फोलि देलथिन | आब हुनकर पिताकेँ नहि रहल गेलनि, ओ कहलथिन - " गोनू, तों तs बापोकेँ नै छोड़लह! | "

- " बाबू, अपने घरमे पहिने बुद्धिक परीक्षा लेबाक चाही आ तखन बाहरक लोक पर हाथ साफ़ करबाक चाही | अहाँ हमरा आशीर्वाद दियs जे हम ऐ विद्या प्रसादे सफल होइत रही | "

- " बेटा संतानकेँ सदा पिताक आशीर्वाद रहैत छैक | तों ऐ पेशामे माहिर बनs तथा तोहर ख्याति दिन दुन्ना - राति चौगुन्ना पसरैत चलि जाओ |

गोनू झा माथ नबाकs पिताक आशीर्वाद ग्रहण कयलनि |
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Maithili kahani - gonu jha ka kali ka aasirbad

मिथिलामे माँ काली शक्तिक अवतार मानल जाइत छथि | गोनू झा हुनकहि उपासक छलाह | हुनक उपासना कयलाक बादहि ओ कोनो आन काज करैत छलाह | तेँ हुनका प्रत्येक काजमे सफलता भेटैत छलनि |

एक दिन गोनू झा निशचय कयलनि जे, जेना हो, माँ कालीक दर्शन कायल जाय | एहि लेल ओ निरन्तर हुनक आराधना करय लगलाह | काली प्रसन्न भेलथिन आ निशचय कयलनि जे साक्षात् दर्शन देबासँ पूर्व गोनू झाक साहसक परीक्षा लेल जाय |

एक राति गोनू झा सूतल रहथि | निसभेर रातिमे माँ कालीक दर्शन देलथिन | हुनकर रूप विकराल छल | एक सय मुहँ रहनि मुदा हाथ दुइये टा | गोनू बाबू हुनकर ई रूप देखि कनिको विचलित नहि भेलाह | ओ पहिने तs हुनका प्रणाम कयलनि मुदा गोनू ठठाकs हँसि पड़लाह |

माँ कालीककेँ विशवाश रहनि जे हुनकर ई भयंकर रूप देखि गोनू झा विचलित भs उठताह, मुदा हुनका हँसैत देखि पुछलथिन - " की, हमर ई रूप देखि अहाँकेँ डर नै भेल? "

गोनू झा कहलथिन - माँ बाघसँ डर होइत छैक मुदा ओकर बच्चा ओकरासँ कनेको नहि डराइत अछि, अपितु ओकरा देह पर कदैत - फनैत रहैत अछि | तखन अहीं कहू जे अहाँ सँ अहाँक नेनाकेँ डर लगतै? "

माँ काली कहलथिन - " गोनू अहाँक मन्तव्य एकदम सत्य अछि | मुदा ई तs कहू जे हमरा देखि अहाँकेँ हँसि कियक लागि गेल? "

गोनू झाक उत्तर भेलनि - " हे माँ हमरा मात्र एक मुहँ आ एक नाक अछि, मुदा दु टा हाथ रहितो सर्दी भेला पर नाक पोछैत - पोछैत फिरीसान रहैत छी " |

- " अहाँ कहs की चाहैत छी ? "

- " अहाँकेँ एक सय मूँह आ एक सय नाक अछि, मुदा हाथ दुइये टा | हमरा चिन्ता भs गेल जे सर्दी भेला पर अहाँ अपन नाक सभ कोना पोछैत होयब | आ यैह कल्पना करैत हमरा हँसी लागि गेल " |
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Maithili kahani - aakta chhala gonu jha


हमरा गोनू झाक मादे किछु नहि कहबाक अछि | गोनू झा स्वयं एक टा चरित्र छथि जे अपने खिस्सामे बहुत किछु कहि जाइत छति |

गोनू झा कोनो खिस्सा नहि लिखलनि | हुनकर सम्पूर्ण जीवने एहन-एहन विशेषतासं भरल - पुरल छल जे ओ खिस्सा बनि गेल | आ जे खिस्सा एखन मिथिलाक गाम - गाममे बूढ - पुरनियांसं सुनल जा सकैछ, प्रसंगवश कोनो उदहारणमें प्रयोग होइत देखल जा सकैछ |

अपन देशमें एहि चरित्रसं मिलैत - जुलैत बहुतो चरित्रक खिस्सा प्रचलित अछि. जाहिमे प्रचलित अछि बीरबल, तेनालीराम, गोपाल भीड़, देवन मिसर, आदि | मुदा गोनू झा एहि सभसँ भिन्न छथि | हिनक खिस्सामें अलगटटे चिन्हल जा सकैछ, कारण एहि खिस्सा सभक ह्रदय रहैत छैक धुर्तई | आ तें गोनू झाकें ' धूर्त - शिरोमणि ' क विशेषणसं अभिहित कयल जाइत अछि | गोनू झा वीरबल, तेनालीराम, गोपाल भांड, अथवा अन्य अन्य परिचित चरित्रसं भिन्न रहने एखनो जीवित छथि |

गोनू झाक ई चरित्र - कथा कतहु लिपिदिध नहि अछि | एही कथा सभकें मिथिलामें कहबाक परम्परा रहल अछि | आ जे नाटकक एक उपांग ' एकालाप ' सदृश होइछ | कथा कहबा काल कथावाचक किछु बात तं शब्दशः कहैछ मुदा बहुत रास बात ओकर भाव - भंगिमा द्वारा अभिव्यक्त होइछ | आ सैह भावः - भंगिमा गोनू झाक चरित्र - कथाक चमत्कार अछि | अर्थात् जखन कथामे निहित धुर्तई आ कथा वाचकक भावः - भंगिमा संगमे होइछ तखने गोनू झाक असली कथाक सागर लहरा उठैछ |
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Sunday, 4 September 2011

Maithili kahani - gonu jha ka bilar


गोनू झाक बुद्धिमत्ताक लोहा सभ कियो मानैत छल । अपन बुद्धिमत्तेक बल पर ओ मिथिलाक राजदरवार मे आदर पबैत छलाह । एक बेर मिथिला नरेशक मोन मे एकटा विचार आयल । ओ अपन सभ दरबारी के बजौलनि आ एक-एकटा विलाड़ि सभ कें दैत आदेश देलैन जे एहि बिलाड़ि के तीन महीन धरि पालू-पोषू आ तत्पश्चात्‌ जकर बिलाड़ि अधिक बलिष्ठ रहत, हुनका इनाम भेटत । नरेशक आदेश रहनि । सभ कियो आदेश मानबाक लेल विवश छलाह । सभ अपन-अपन बिलाड़ि लेलनि आ ओकर खूब पालन करय लगलाह जे कदाचित हमरे इनाम भेटि जायत ।

गोनू सेहो बिलाड़िक संग घर पहुँचलाह । ओहो ओकर सेवा-सुश्रुषा मे लागि गेलाह । घर मे महीस जे दूध दैन से बिलाड़िक भोजन मे चलि जाइक । दू-चारि दिन तँ ठीक लगलनि, परन्तु बाद मे गोनू कें ई बात ठीक नहि लगलनि जे महीस पोसी हम आ दूध पीबय ई बिलाड़ि । ओ एहि युक्ति मे लागि गेलाह जे कोन तरहें दूध बांचि जाय आ इनामो भेटि जाय । अंतत: हुनका एकटा उपाय सुझलनि ।

अगिला दिन भोरे ओ महीस दुहलाह । दूध औंटबेलाह । गरम-गरम दूधक लोहिया ओ आंगन मे रखलाह आ तत्पश्चात्‌ बिलाड़ि के बड़ प्रेम सँ चुचकारलाह । बिलाड़ि दूध देखैत देरी लगीच पहुँचल । गोनू बिलाड़ कें गरदनि सँ पकड़लाह आ गरम दूध मे ओकर मूड़ी डुबा देलनि । बिलाड़ि छटपटायल आ पुन: देह झाड़ि ओतय सँ भागल । आब बिलाड़ि दूध कें देखैत देरी भागि जाय । गोनू निश्चिंत भेलाह आ शान सँ दूध-दही अपने खाय लगलाह । धीरे-धीरे तीन महीनाक अवधि समाप्त भऽ गेल । ओ दिन आबि गेल जहिया मिथिला नरेश बिलाड़िक प्रतिपालनक लेल इनाम बँटताह । सभ कियो अपन-अपन बिलाड़िक संग उपस्थित भेलाह । गोनू सेहो अपन सामान्य बिलाड़ि कें लऽ दर्बार मे हाजिर भेलाह ।

सभक बिलाड़ि एक सँ एक बलिष्ठ रहैक । मिथिला नरेशक लेल निर्णय करब कठिन रहैन । परन्तु गोनूक बिलाड़ि सभ सँ कमजोर रहनि । नरेश गोनू सँ एकर कारण पुछलाह । गोनू बजलाह – महाराज! हमर बिलाड़ि तऽ दूध पीबिते नहि अछि तखन हम की करी? बिलाड़ि दूध नहि पीबैत अछि, एहि गप्प पर सहसा केकरो विश्वास नहि भेलैक । तथापि प्रमाणक लेल एकटा बर्तन मे दूध मँगाओल गेल । दूध के देखितहि गोनूक बिलाड़ि ओतय सँ भागय लागल । सौंसे राज-दरबार देखलक जे गोनूक कहब ठीक छनि । अंतत: मिथिला नरेश बजलाह – बिनु दूध पीने गोनूक बिलाड़ि ठीक छनि तें इनाम गोनू कें भेटबाक चाही । संपूर्ण राजदरबार अचंभित रहि गेल नरेशक निर्णय सँ ।

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Story of gonu jha


गोनू झा मृत्युशय्या पर छलाह | प्राण अब-तबमे रहनि | पूरा गाम उनटल रहय महापुरुषक महाप्रयाणक बेलामे | तखने गोनू झाकें कने होस अयलनि, बजलाह – ” भोनू! भोनू!! “
भोनू दौड़लाह हुनकर मुहँ लग – ” की कहे छी भाई? कोनो इच्छा? “
गोनू बजलाह – ” नहि, आब किछु नहि, गोदान करा दैह | “
फेर गोनू थम्हि बजलाह – “हे! एकटा एहन गाय ताकू जे गोदान बाद हमरहि संगे ओकरो प्राण छूटि जाइक | नहि कतौ भेटय तs अपने खुट्टा परक फोलि आनु | जाउ, जल्दी जाउ | आब हमर समय समाप्त भs रहल अछि | “
पूरा वातावरण नोरा गेल | तुरत एक गोटो गाय – फोलि लs अनलक | गोनू बाबू गायक नांगरि धयलनि | मंत्रोच्चारण भेल | आ गोनू – गाय दुनु टगि गेल |
आ गोनू बाबू ऐ पृथ्वी सं विदा भs गेलाह |
एकर बाद गोनू बाबू स्वर्गमें रहथि | हीनकर क्रिया – कर्मक लेखा – जोखा भs रहल छल | चित्रगुप्त महाराज फेरिमे रहथि | एहन लोक आइ धरि नहि देखल | हिनकर कोन क्रिया पुण्य तथा कोन पाप तकरा फडिछायब बड़ दुरुह |
जखन चित्रगुप्त महाराजसं हिनकर समस्या नहि सोझरयलनि तs यमराज स्वयं एहिमे पड़लाह | हुनकर सभ कागज – पत्र देखलनि आ अन्तमें गोनू कें कहलखिन जे आहाँ अपन जीवनमे बस एकटा पुण्य कयलहूँ जे गौ-दान कयल | बाजू आहाँ, आब की करs चाहब |
गोनू कनेक सोचलनि आ फेर कहलखिन हमरा हमर गायकें मंगा देल जाओ |
यमराजक आदेश भेलनि | गाय आनल गेलिओ हुनका सुपुर्द करैत यमराज कहलखिन – “यैह आहाँक सम्पति भेल | एहिसँ आहाँकें गुजर करबाक अछि | ई गाय अहिं टाक बात मानत | बस | “
कहैत यमराज सभा विसर्जित कयलनि | एम्हर गोनू गायक पीठ पीठ सोहरोलनि आ ओकरा कानमे किछु कहलखिन | कि एकाएक स्वर्ग में हरबिररो मचि गेल | गाय यमराज आ चित्रगुप्त दुनुकें चौताड़s लागल | दुनु भगैत जाथि आ ओ दुनुकें हड़पेटने जानि |
एहिना जखन बड़ीकाल चलैत रहल तs यमराज घुरछी कटैत गोनू लग आबि खसि पड़लाह – ” जो हम तोरा सं हारि मानलाहूँ |
” तों स्वर्गमें रहs योग्य नहि छें | ” फेर अपन सेवकें आदेश दैत कहलनि – ‘ गोनू कें पृथ्वी परक मिथिलापुरी खण्ड पठा देल जाय | “
आ गोनू पुनः मिथिला आबि गेलाह ओ एखनो जीवि़त छथि | मरलाह नहि | मरबो नहि करताह |
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Saturday, 3 September 2011

Maithili story of Gonu jha


गोनू झाक एक बेर माल – जालक हाट गेलाह तथा ओतs सं नीक बरद किनने अयलाह | पैसाक किल्लति रहिन तें एकटा किनलनि | सोचलनि जे पाइ होयत तं जोड़ा लगा लेब | एहि वर्ष ककरो संग भजैती कs लेब | यैह सभ सोचैत गोनू झा गाम दिस आबि रहल छलाह | कि तखने एक गोटे पुछलथिन-’गोनू बाबू... कतेकमे पटल? “
- ” पौन सयमे भेल| ‘ गोनू बाबू हुलसैत उत्तर देलथिन आ बात पर आगू बढ़ैत गेलाह | तखने एकटा जजमान सं भेट भs गेलनि | ओही वैह प्रशन कs देलथिन- ” पुरहित, कतेक पर टुटलै? “
-” यैह, पौन सयमे | ” गोनू झा उत्तर देलथिन |
एवम् क्रमे गोनू बाबूक गाम जेना – जेना लगीच भेल जानि, पुछनिहारक संख्यामे वृद्धि भेल जनि | गोनू बाबू पूर्वमे तs बड़ हुलसिकs उत्तर दैत जाइत छलथिन | मुदा बादमे क्रमशः एहि प्रशन पुछनिहार सभसं आजिज भs उठलाह | ककरा उत्तर देथु, ककरा नहि देथु | हुनकर बरद किनबाक जे ख़ुशी रहनि, से दुःख मे परिवर्तित होबs लगलनि |
मुदा गोनू बाबू अपनाकें एहिसँ असम्प्रक्त्त रखबाक प्रयास करs लगलाह | मुदा से हो तs कोना हो? यैह प्रशन बेर-बेर दिमागमे घुरिआय लगलनि | कि तखने एकटा बुद्धि फुरलनि | एम्हर एही चिन्तन-मंथनमे गाम सेहो आबि गेल रहनि | एकाएक ओ बरद्कें बाधक कातक एकटा गाछक सोइरमे देलनि आ अपन गाछक फुनगी पर जाकs बैसि रहलाह | नीक जकाँ जखन बैसि रहलाह सं ओहीठामसं चीकरब शुरू कयलनि- ‘ दौडै जाइ जाह हो लोक सभ……………मरलौं होsssss!! “
चिकरबाक ई अन्तहीन सिलसिला तखन ख़तम भेलनि जखन हुनका ई बुझा गेलनि जे गामक प्रायः सभ लोक जुमि गेलाह अछि |
गोनू झा गsरकें साफ़ करैत नीचाँ उतरय लगलाह | प्रशन पुछनिहारक संख्या बढ़ैत गेल – कि भेल ? किए चिकरै छलौं | कोना गाछ पर चढ़लौं आदि – आदि |
गोनू बाबू ताधरि मौन छलाह | नीचा आबि कने आस्वस्त भेलाह तथा सहटिकs बरद लग अयलाह | तदुपरांत ओ कनेक खखसलाह आ बाजि उठलाह – ” सुनि लियs! आब हम फेर नहि बाजब | हम उत्तर दैत – दैत थाकि गेल छी | तें सोचल जे समिलाते बजा, स्पष्ट कs देल जाय | हम एहिसँ बड़ व्यथित छी………|
- आखिर की बात छै गोनू बाबू?? ” सम्मिलित प्रशन छुटलनि |
- ” बात किछु नहि अछि” गोनू बाबू स्पष्ट करैत कहलथिन- ” हम इ बरद किनलहूँ अछि | एकर दाम अछि पोन सय | अदन्त अछि | बधिया अछि…….| “
गोनू बाबू कनी रुकलाह, फेर बजैत भेलाह- ” आब ऐ सं बेसी हमरा किछु नहि कहबाक अछि | तथा अहूँ सभसँ आग्रह जे फेर हमरा ऐ बरदक मादे किछु नहि टोकू, बस |
एतबा कहैत ओ बरद फोललनि आ निकसि गेलाह | उपस्थिति लोक सभक कंटमे आयल बात मूहँमे आबि अंटकि गेलनि |

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